Author: Shweta Kumari
DOI Link : https://doi.org/10.70798/Bijmrd/020500015
Abstract : नामवर सिंह ने अपना आलोचकीय जीवन ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योगदान’ से आरंभ किया था। इसमें अपभ्रंश साहित्य पर विचार करते हुए उन्होंने सूक्ष्मदर्शिता और सहृदयता के साथ मार्क्सवादी आलोचना पद्धति का रूप प्रस्तुत किया है। वे पिछले 57-58 वर्षों से हिंदी आलोचना के केंद्रीय किरदार रहे हैं। हिंदी आलोचना की यह विडंबना रही है कि महत्वपूर्ण आलोचक भी एक समय के बाद नए साहित्य के भावबोध को नहीं पहचान पाते, लेकिन नामवर सिंह इसमें अपवाद हैं। हिंदी के अधिकांश आलोचक मूलतः कवि थे, इसलिए उनकी दृष्टि कविता पर ही केंद्रित रही और गद्य विधाओं की उपेक्षा हुई। नामवर सिंह ने भी कविता से शुरुआत की, लेकिन उन्होंने कहानी आलोचना को भी नया फलक प्रदान किया।
उन्होंने आलोचना को ‘सफाई’ के कार्य के रूप में देखा। उनके अनुसार, साहित्य के मंदिर को भक्तों के पैरों की धूल से साफ करना पूजा से पहले जरूरी है। उन्होंने मुक्तिबोध के शब्दों में स्वयं को ‘साहित्य का मेहतर’ मानकर आलोचना कर्म किया।
Keywords:
Page No : 115-124
